बिहार की शिक्षा व्यवस्था – पता नहीं कब सुधरेगी?

क्या स्कूलों की दशा सुधारे बगैर सिर्फ कोचिंग के सहारे बिहार की शिक्षा व्यवस्था को सुधारना संभव है? रिजल्ट का मौसम चल रहा है, और हमने अपने पिछले पोस्ट में आपको बताया था की नीट में बिहार के शिवहर की रहने वाली कल्पना कुमारी ने पुरे देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया है, कुछ दिन बाद आए बिहार बोर्ड इंटर साइंस परीक्षा के परिणाम में भी कल्पना कुमारी ने टॉप किया | कल्पना कुमारी ने इस उपलब्धि को दिल्ली के एक कोचिंग में पढाई करके हासिल किया है|

तमाम अन्य छात्र-छात्राएं इसी तरह कोटा और अन्य स्थानों पर रहकर अपने विद्यालय के बजाए कोचिंग में रहकर पढाई करते है| यह प्रविर्ति साल दर साल बढती ही जा रही है| अब तो कल्पना कुमारी के उदाहरण के बाद इसमें तेज़ इजाफा होने की संभावना है |

School Building

अब कुछ सवाल :-

  • अपने विद्यालयों के प्रति इस मोहभंग की वजह क्या है ?
  • कोचिंग संस्थानों में ऐसा क्या है जो विद्यालयों में नहीं है ?
  • क्या उन कमीयों को दूर करने के लिए कोई कदम उठाया जा रहा है ?
  • क्या विद्यार्थियों के लिए न्यूनतम अटेंडेंस अनिवार्य नहीं होना चाहिए ?

 बिहार की शिक्षा प्रणाली को इस संकट से बाहर कैसे निकाला जा सकता है ?

छात्र-छात्राएं कहाँ पढ़े, क्या यह उनकी मर्ज़ी पे छोड़ देना चाहिए? हम किसी की मर्ज़ी को दबाव डाल कर बदल तो नहीं सकते, पर शिक्षा व्यवस्था में सुधार करके, पढाई के स्तर में सुधर लाके, इस खाई को पाट जरुर सकते है| आखिर कौन अपने घर से दूर रहना चाहता है, अगर उन्हें घर में रहकर बेहतर करने का मौका मिले तो वो क्यूँ बाहर जाना चाहेंगे?

कहाँ चुक हुई है? एक समय नालंदा और तक्षशिला की धरती आज शिक्षा व्यवस्था में इतनी पीछे क्यूँ रह गयी, सवाल तो कई है, पर इनका जवाब किसी के पास नहीं है |

Classroom in Bihar

एक सर्वेक्षण – अमर्त्य सेन के द्वारा स्थापित गैर सरकारी संस्थान “प्रतीची ट्रस्ट” और पटना की संस्थान “आद्री” ने संयुक्त रूप से पिछले साल राज्य के 5 जिलो के गाँवो में सर्वेक्षण किया, जिस सर्वेक्षण में बातें तो कई सामने आई पर कुछ मुख्य बातें ये थी –

  • सरकारी स्कूल में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है, अभी भी क्लास रूम की व्यवस्था नहीं है
  • शौचालय का ना होना भी एक प्राथमिक कारण है, लड़कियों के स्कूल छोड़ने का
  • शिक्षकों की, खास कर योग्य शिक्षकों की भारी कमी है
  • जो शिक्षक है भी उनमे से अधिकांश स्कूल में उपस्थित नहीं रहते
  • सबसे बड़ी कमी तो सरकारी तंत्र और निगरानी करने वालो की है, इनकी निष्क्रियता की वजह से हमारी शिक्षा व्यवस्था इस कदर बदहाल है|

इस बात को और गहराई से समझने क लिए मैंने भी अपने गाँव के कुछ लोगो से बात करने की कोशिश की, मुझे जो जवाब मिला  वो रिपोर्ट से काफी मिलती जुलती है, उस बात का एक छोटा सा अंश –

हल ही में मै अपने गाँव के सबसे मेधावी माने जाने वाले छात्र से मिली, उसका नाम पंकज है, एक दोपहर जब मै उसके घर गयी तो वो घर पर ही था, जब मैंने उस से स्कूल ना जाने की वजह पूछा तो उसने कहा –“स्कूल जाने का कोई फायदा ही नहीं है, कुछ पढाई ही नहीं होती है, इसीलिए कोई नहीं आता, अगर स्कूल चले भी गए तो शिक्षक हेडमास्टर की कक्ष में बैठ कर गप्पे मरते रहते है, उस से भी बड़ी बात शिक्षक 11-11:30 के बीच आते है और 1 बजे तक चले जाते है, इसमें क्या पढाई होगी”

आगे जब मैंने उनके माँ-बाप से पूछा की वो शिकायत क्यूँ नहीं करते तो उनका कहनाम था – “किसी को कुछ भी कहने का क्या फायदा है, शिक्षक और हेडमास्टर दोनों ही गप्पे मारते है तो उन्हें समझाएगा कौन, सरकारी  नौकर है ये लोग, जब सरकार ही सख्त नहीं है तो हम और आप शिकायत करके इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते”

इस छोटे से वाकये से ये समझ आया की जवाबदेही है किसकी?

ये तो कुछ बातें थी प्राथमिक शिक्षा की, बिहार में उच्च शिक्षा की भी हालत कुछ ज्यादा अच्छी नहीं है –

नज़र डालते है कुछ और आंकड़ो परहैरान करने वाली बात है की बिहार में एक लाख की आबादी पर मात्र 7 कॉलेज है, जबकि राष्ट्रीय औसत 27 का है, बिहार में प्रति कॉलेज 2098 विद्यार्थियों का नामांकन होता है, जबकि राष्ट्रीय औसत 764 है| ये आंकड़े किस तरह की शिक्षा पद्धती का उदहारण है | उस से बड़ी बात पटना यूनिवर्सिटी को छोड़ दिया जाए तो बाकि किसी भी यूनिवर्सिटी चाहे मगध, मंडल या आंबेडकर यूनिवर्सिटी में 3 साल की स्नातक की डिग्री 5 साल से पहले तो पूरी नहीं होती|

3 साल के स्नातक की डिग्री 5 साल में करने वाले विद्यार्थियों के भविष्य के बारे में बात न ही की जाए तो अच्छा रहेगा| बात सिर्फ इतनी नहीं है की 3 साल की डिग्री 5 साल में मिलती है, कमी तो यहाँ भी शिक्षकों की है, बुनयादी ढांचे की कमी तो यहाँ भी है, कक्षाए ना हो पाना तो एक समस्या यहाँ भी है, बिना कॉलेज गए 75 % अटेंडेंस मिल तो यहाँ भी जाती है| कहने का अर्थ बस इतना सा है की बिहार की शिक्षा व्यवस्था न केवल अपंग हो चुकी है बल्कि बूढी भी हो चुकी है, इसके पुर्नुद्धार का इंतज़ार हम सभी को है|

अब बात करते है आखिर शुरुआत कहा से हुई,

हमारे ऑफिस के एक सीनियर से बात करने पर पता चला की शिक्षा व्यवस्था की ये दशा कुछ 20-25 साल पहले ख़राब होनी शुरू हुई थी (अब उनके शब्दों में) – “हमारे गाँव में आज से लगभग 25 साल पहले  3 स्कूल हुआ करते थे, मिडिल स्कूल, हाई स्कूल और संस्कृत स्कूल, गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाने पर हमलोग भी वहां पढने चले जाया करते थे, आज 25 सालों के बाद वो तीनो स्कूल की जगह पर खली मैदान एक झरझर से बिल्डिंग बस इतने ही बचे है”  आगे मैंने पूछा तो अब बच्चे पढने कहा जाते है – तो जवाब और हैरान करने वाला आया, “अब वो 10-15 किलोमीटर किसी अन्य विद्यालय में पढने जाते हैं” 

Lalu and Nitish

ऐसी हालत हमारे शिक्षा व्यवस्था की आखिर किसने की? कोई जवाब नहीं है इसका, न कोई देना चाहता है|

पर हमारे शिक्षा व्यवस्था की इस हालत का जिम्मेदार सिर्फ एक है, वो है “राजनीती”, लालू यादव जी ने चरवाहा विद्यालय बनाकर हमारी शिक्षा व्यवस्था को ही चर लिया और हमारे नौजवानों और बच्चो को निरक्षरता, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और गरीबी सौगात में दी| इन मुद्दों पे राजनीती इतनी गहरा सी गयी है की कोई भी राजनेता इन मुद्दों पे राजनीती के आलावा और कुछ करना ही नहीं चाहता|

हमारे सुशासन बाबु ने मिड डे मील, ड्रेस, साइकिल देकर शिक्षा की तरफ लोगो का रुझान बढाया है और पिछले एक दशक में बिहार में साक्षरता वृद्धि की दर 17 प्रतिशत होने को रिपोर्ट में शुभ संकेत माना गया है। लेकिन इस साक्षरता वृद्धि के बावजूद बिहार में साक्षरता का प्रतिशत 63.8 तक ही पहुंच पाया है, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे कम है। पर गौर करने वाली बात ये है की भले ही इन आंकड़ो में वृद्धि पाई गयी है, पर क्या साक्षरो की गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी या सुधार हुई है? अभी भी बिना पढ़े लिखे लोग टॉप कर रहे है, उदाहरण “रूबी” और “सौरभ”, इनका परिचय तो अप सब जानते है, मुझे कुछ लिखने की जरुरत ही नहीं है |

तो न केवल शिक्षा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की जरुरत है, बल्कि गुणवत्ता में भी सुधर की काफी जरुरत है|

अगर सरकार शराब बंदी और उसे लागु करने के कामों से थोरा फुर्सत में आती है तो उन्हें शिक्षा व्यवस्था की सुधार की तरफ भी आगे बढ़ना चाहिए और मूल मुद्दों पे ध्यान देना चाहिए|

 

“पढ़ेगा बिहार तभी तो आगे बढेगा बिहार”

Anubha Rani

I'm an avid reader, a foodie, and a movie buff; who is passionate about the positivity around us. I love to dream and convert those dreams into words. At one moment I'm inside a shell and the very next moment I'm the ferocious one. Dynamism is my forte. Apart from being a dreamer, I'm also a woman with a beating heart and a curious mind questioning traditional social norms. I'm a rebel at one moment and just opposite at the very next moment. My fuel is the smile of my son, the happiness of my family, and lots of coffee. I'm also not ashamed of spending money on buying books and to fill my (always empty) stomach.

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