राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को उनकी पुण्य तिथि पर नमन

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की आज चौवालीसवीं पुण्य तिथि है| अपनी लेखनी से जो योगदान इन्होने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में दिया वो अविष्मरणीय है| एक कवि एवं साहित्यकार होने के अलावा दिनकर ने भागलपुर विश्वविद्यालय के उप कुलपति पद को भी सुशोभित किया| तीन बार उन्हें राज्य सभा के लिए मनोनीत किया गया, 3 अप्रैल 1952 से 26 जनवरी 1964 तक को राज्य सभा के सदस्य रहे| देश को उनके अतुलनीय योगदान के लिए रामधारी सिंह दिनकर जी को 1959 में पद्म भूषण से अलंकृत किया गया|

दिनकर जी राष्ट्रकवि थे, संपूर्ण भारत पर उनका और संपूर्ण भारत का उनपर समान अधिकार है| उनकी पहचान और उनकी लेखनी को किसी गाँव, शहर, राज्य और देश की सीमा से बांधना उनके व्यक्तित्व का अपमान होगा| बिहार में बेगुसराय जिले के सिमरिया में इनका जन्म हुआ था| जीवन के हर रंग को इन्होने बहुत कम समय में देख लिया| गरीबी और बेरोजगारी से उपजी ज़िन्दगी में जो कष्ट एक बालक को झेलना पड़ा शायद उसी की झलक इन पंक्तियों में है:

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है
छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है
मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है
वसन कहाँ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है

Rashtrakavi

दिनकर जी एक ऐसे कवि थे जो क्रांतिकारी विचारधारा के होते हुए भी गांधीवादी थे| उन्होंने अपनी रचना “कुरुक्षेत्र” में इस बात का उद्धरण दिया है कि, “युद्ध विनाशकारी है लेकिन स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति कि सुरक्षा के लिए यदा कदा युद्ध आवश्यक भी है|

सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

दिनकर जी एक कालजयी कवि थे| भारत देश की परिकल्पना और इस देश की समस्याओं के लिए जैसे उन्होंने पहले ही देश को सचेत कर दिया था| स्वराज और इसके असली स्वरुप पर सवाल उठाते हुए दिनकर जी ने जो कहा क्या वो आज भी प्रासंगिक नहीं है?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

दिनकर जी की रचनाएं एक से बढ़कर एक है| उन्हें किसी एक लेख में उधृत करना असंभव है| लेकिन वीर रस में लिखी उनकी एक भी रचना को हम भारतवासी अगर आत्मसात कर सकें, तो ये हमारी देशभक्ति का मूल उदहारण होगा|

Anubha Rani

I'm an avid reader, a foodie, and a movie buff; who is passionate about the positivity around us. I love to dream and convert those dreams into words. At one moment I'm inside a shell and the very next moment I'm the ferocious one. Dynamism is my forte. Apart from being a dreamer, I'm also a woman with a beating heart and a curious mind questioning traditional social norms. I'm a rebel at one moment and just opposite at the very next moment. My fuel is the smile of my son, the happiness of my family, and lots of coffee. I'm also not ashamed of spending money on buying books and to fill my (always empty) stomach.

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