आज की राजनीतिक काल पर एक कविता- प्रियांशु शेखर

भारत दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र है। मुगलों, मौर्य, ब्रिटिश और अन्य कई शासकों द्वारा शताब्दियों तक शासित होने के बाद भारत आखिरकार 1947 में आजादी के बाद एक लोकतांत्रिक देश बन गया। लोकतंत्र एक सरकार की ही प्रणाली है, जो कि हमारी जनता को अपना वोट देने और अपने मनपसंद की सरकार का गठन करने की अनुमति प्रदान करती है। 1947 में ब्रिटिश सरकार से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत पूरी दुनिया का एक सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र बन चुका है।

लेकिन बीते पांच सालों में भारतीय राजनीति में नेताओं के अलग अलग रूप दिखाई दिए ,जो कल तक एक दूसरें पर टिप्पणी करते थे आज वो साथ में मंच साझा कर रहे हैं| इसमें कोई दोराय नही है की ये नेताओं के लिए आम बात है| आज से कुछ दिन पहले लोकसभा चुनाव का आगमन हुआ, नेताओं की जुबान गोली से ज्यादा तेज़ चलने लगी, बोलते बोलते उन्होंने महिलाओं तक की इज्ज़त नहीं की| ख़ैर भारत के लोकतांत्रिक देश है यहाँ कोई कुछ भी बोलता है|

प्रियांशु शेखर जो कि ग्रेजुएट के छात्र हैं वो बताते हैं कि उन्होंने नेताओं को अपने जिले के लिए कई वादे करते सुने हैं लेकिन आज तक कोई पूरा नहीं हुआ| आगे बात करते वक़्त शेखर ने अपनी एक कविता सुनाई जो आज के राजनीतिक काल में बिलकुल फीट बैठती है|priyanshu_shekhar

 

  दुश्मन के दुश्मन

दोस्त हो रहे हैं

लूटने के डर से

चोर लूटेरे सब

एक हो रहे हैं

मेरे देश में

चुनाव हो रहे हैं

 

जिसको जिससे डर

उसके साथ सेट हो रहे हैं

कल तक जो

फूटी आँख न सुहाते

अब एक दूसरे हेतु

परफेक्ट हो रहे हैं

मेरे देश में

चुनाव हो रहे हैं

 

बेधड़क जुमलेबाजी

वादे पे वादे हो रहे हैं

नेता जी मर्यादा खो कर

गाली पे गाली दे रहे हैं

कौन किसको कितना

निचा दिखला दे

इस चक्कर में

खुद ही साबित खुद को

नीच कर रहे हैं

मेरे देश में

चुनाव हो रहे हैं

 

भोली जनता

चिंतन में अब डूब रही हैं

नेता जी की

खाता बही अब खुल रही

जात चुने या चुने कुजात

गंभीर सवालो से वो घिर रही हैं

पर कर्ज में डूबे

भूखे पेट दिमाग कहाँ चलता है

दे दो उसको वोट

 पेट भरने का जो वादा करता है

गरीबी दूर करने का जो वादा करता है

कुछ यूँ मेरे देश में

चुनाव होता हैं

 

लोकतंत्र में

जनता ही जनार्दन हैं

मांस विहीन अधनंगी

हड्डीवाले ढांचों के चरणों में

नेता जी जो पड़ रहे है

मेरे देश में

चुनाव हो रहे हैं

 

किसी का पेट भरके

किसी की जेब भरके

किसी को पान खिला के

किसी को दारू पिला के

वोट लिए जा रहे हैं

इन प्रपंचो के सहारे

भोजन भवन

पठन पाठन

रोजी रोजगार के

मुद्दे गौण किये जा रहे हैं

मेरे देश में

चुनाव हो रहे हैं

                                                                                                                             -Priyanshu shekhar

 

Rohit Jha

A writer who is willing to produce a work of art, To note, To pin down, To build up, To make something, To make a great flower out of life even if it's a cactus.

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