महिला दिवस विशेष

बदलते वक्त ने महिलाओं को आर्थिक, शैक्षिक, और सामाजिक रूप से सशक्त किया है; और उनकी हैसियत एवं सम्मान में वृद्धि हुई है। इसके बावजूद अगर कुछ नहीं बदला है, तो वह है समाज की सोच, आज भी महिलाओं को वो अधिकार नहीं मिलता जिसकी वो हक़दार हैं। हर रोज, हर कदम पर कहीं न कहीं उन्हें अपने महिला होने का दर्द चुपचाप सहना होता है|

women protested

भारतीय संस्कृति में महिलाओं को बहुत  महत्व दिया गया था| क्या वो आज भी बरक़रार है, क्या आज हम अपनी माँ-बहन के साथ दूसरों की माँ-बहन की भी उतनी ही इज़्ज़त करते हैं? महिला दिवस पर आज हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे।

यह औरत कोई बोझ नहीं, बोझ बनाया हमने है,

इन औरतों का बोझ हम क्या जाने, जो कभी उठाया ना हमने है।

पढाई से लेकर रोजगार, घर से लेकर बाहर, और हर उस क्षेत्र में जहाँ सिर्फ पुरुषों का बोलबाला था, अब महिलाएं कंधे से कन्धा मिलाकर पुरुषों का वर्चस्व तोड़ रही हैं। खासकर व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं के काम का दायरा बहुत बढ़ा है। लेकिन कामयाबी के बावजूद परिवार से जो सहयोग उन्हें मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है। महिलाएं आज के दौर में डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकारिता, और यहाँ तक की सेना और पुलिस में भी अपनी जिम्मेदारियाँ बखूबी निभा रही हैं| वही दूसरी ओर बहुत सी महिलाओं को आज भी घर से निकलने पर पाबंदी है| उन्हें कहा जाता है की आप सिर्फ घर गृहस्थी संभालने के लिए ही हो। क्या सच में? कैसी विडम्बना है ये?

इस संदर्भ में हमने कुछ कामकाजी महिलाओं से बात की-

उन्होंने बताया की हम अपने जीवन को दो हिस्सों में जीते हैं एक पिता और दूसरा पति के घर। हमारा सारा जीवन इन्ही के कंट्रोल में होता आया है| कभी पिता की रोक टोक तो कभी इस समाज की। हम अपना सारा जीवन पुरुष के कंधे से कंधे मिलाने की कोशिश में ही निकाल देते हैं। पहले पिता की रोक टोक में बचपन निकल जाता है| फिर शादी के बाद सास-ससुर और पति; उसके बाद जो कुछ कसर बची होती है, वो समाज पूरा कर देता हैं। हम अपने पैरों पर खड़े हैं, इसके बावजूद भी हमे एक बोझ की तरह देखा जाता है। लेकिन हम निराश नहीं हैं, और इस उम्मीद के साथ अपनी मंजिल की ओर बढ़े जा रहे हैं की किसी न किसी दिन तो ये सोच बदलेगी| women empowerment

अब कुछ बाते घरेलू और बिना पढ़ी लिखी औरतों की-

इनकी बाते सुनकर मैंने खुद से पूछा क्या हम इसी समाज का हिस्सा हैं जहाँ औरतो के साथ आज भी ऐसी बातें होती हैं। उन्होंने बताया कि हमे बचपन से ही सिखाया जाता है की औरत घर सँभालने के लिए होती हैं। हमे बचपन से ही पढाई के बारे में नहीं, खाना बनाने के बारे में बताया जाता है| विवाह होने के बाद हमारी जिंदगी  घर-परिवार, चौके-चूल्हे में खटने में ही कब बीत जाता है हमे खुद भी नहीं पता। अपने अरमानों का गला घोंटकर चुपचाप घर-परिवार में ही उलझे रहना पड़ता है। हम क्या चाहते हैं, हमें क्या पसंद है, ये सब कोई मायने ही नहीं रखता| परिवार और घर के प्रति उनका ये त्याग उन्हें सम्मान का अधिकारी बनाता है।

इस दौरान कई महिलाओं ने अपनी आप-बीती भी बताई जो हम यहाँ साझा नहीं कर सकते |

बात करते हैं, हमारे ही देश की एक विचित्र घटना के बारे में-

Rural Area ये घटना है, आंध्र प्रदेश के गांव ठोकालापल्ली की। यहाँ के मर्दो को नाईटी से इतनी नफ़रत है कि औरतें सूरज ढलने से पहले नाईटी पहन भी नहीं सकतीं। इस गांव ने औरतों पर ये बैन लगाया था। इस बैन के पीछे की वजह अपने आप में अजीब है। बात ये है कि नाईटी की वजह से इस गांव के मर्द असहज महसूस करते हैं। अगर कोई भी औरत ये नियम तोड़ती हैं तो उसे 2000 रूपए जुर्माना देना पड़ेगा। इस गांव के बुज़ुर्गों ने ये नियम बनाया था। जिस कमेटी ने ये रूल बनाया उसमें 9 बुज़ुर्ग थे। उनसे आकर गांव के कई मर्दों ने बताया था कि औरतों को नाईटी में देखकर वो असहज महसूस करते हैं| इस कमेटी ने कुछ वीमेन सेल्फ़ हेल्प ग्रुप्स से बात की और फिर ये नियम बनाया| इसके बारे में पूरे गांव में ढोल पीटकर ऐलान किया गया था।

दूसरी शर्मनाक घटना-

राजस्थान के उदयपुर जिले में एक बहुत ही छोटा सा गांव है थमला। इस गांव में मंजू नाम की एक खास महिला रहती हैं| जिनकी जिंदगी संघर्षो से भरी पड़ी है। अभी मंजू की उम्र 38 साल हैं| उनका एक बेटा भी है जो २० साल का है और भी बीए फाइनल ईयर में हैं। मंजू ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं हैं, दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनकी पढाई छुड़वा दी गई। अभी मंजू महिला आधिकारिता विभाग में काम करती है और दिन के 105 रुपए कमाती है। बस इतने ही कम पैसों से वो अपनी और अपने बेटे की सारी चीज़ो का ध्यान रखती हैं।

आप सोच रहे होंगे ये आम बात है क्यूंकि भारत में वैसे भी 87 % महिलाएं का मासिक वेतन 10,000 रूपये से कम है, तो इनकी ही कहानी क्यों? जवाब बड़ा ही मार्मिक है. मंजू के दोनों हाथ कटे हुए हैं| करीब 16 साल पहले मंजू के पति ने उनके दोनों हाथ काट दिए थे। तब से मंजू कोर्ट और पुलिस स्टेशन के चक्कर लगा  रही हैं पर उन्हें इन्साफ नहीं मिला और आरोपी पति आराम से खुलेआम घूम रहा हैं।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि मंजू के पति ने उसके हाथ काट दिए- Rajasthan

मंजू की शादी महज़ 15 साल में ही हो गयी थी। 15 की बच्ची को सही गलत तक का पता नहीं होता और मंजू पर शादी जैसी बड़ी ज़िम्मेदारी डाल दी गयी थी। शादी होने के कुछ दिन बाद ही उसके ससुराल वाले उसे दहेज के लिए ताना मारा करते थे। लेकिन मंजू अपने घर पर कुछ नहीं बताती क्यूंकि उसे पता था कि उसके माता पिता इस क़ाबिल नहीं की फिर से दहेज़ के पैसे दे सके। वो चुपचाप सब सहन करती|

मंजू का पति गुजरात के अहमदाबाद में रहता था। कुछ साल बाद मंजू भी पति के पास रहने चली गई। घर पर चार पैसे ज्यादा आ जाएं, इसलिए वो वहां दूसरों के घरों में जाकर झाड़ू-पोंछा करने लगी और यही उसकी जिंदगी  की सबसे बड़ी गलती बन  गयी। एक दिन मंजू ऐसे ही अपने काम पर गई हुई थी। उस दिन ज्यादा काम नहीं था, इसलिए घर जल्दी लौट गई। घर में घुसते ही उसने देखा कि उसका पति किसी दूसरी औरत के साथ था। मंजू ने दोनों को आपत्तिजनक हालत में देखा। उसने इस बात का  विरोध किया, तो पति ने उसे जमकर पीटा।

मंजू के पति और उसकी प्रेमिका उसे घर के अंदर लेकर गयी, दोनों ने मिलकर पहले तो मंजू की पिटाई की और  बाद में उसके दोनों हाथ काट दिए। हाथ कटने के बाद जब मंजू बेहोश हो गई तो उसके पति और उसकी प्रेमिका ने मंजू को मरा हुआ समझकर पास बने रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया। ट्रैक पर बेहोश मंजू को पड़ा देख, किसी भले आदमी ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया। मंजू को कुछ दिन बाद होश आया पर उसकी दुनिया पूरी तरह बदल गयी थी| उसके दोनों हाथ कट चुके थे, पर जज़्बा कम नहीं हुआ था।

शादी के पहले तक मंजू ने केवल 6वीं तक पढ़ाई की थी। हाथ कट जाने के बाद मंजू ने किसी तरह 10वीं कर डाली। 2007 में महिला आधिकारिता विभाग से जुड़कर मंजू ने ग्राम पंचायत के लिए काम करना शुरू किया।  अभी मंजू हर सप्ताह रिपोर्ट लिखती है। कटे हुए हाथ होने के बावज़ूद हाथो के साथ पैरों से भी लिखती है।

भले ही मंजू ने किसी तरह जीना सीख लिया है, लेकिन उसकी जिंदगी में आज भी परेशानियां कम नहीं हैं।  हाथ कट जाने के बाद भी वो दिन-रात मेहनत कर रही है। दिन के 105 रुपए कमाती है। अपने बेटे को पढ़ा रही हैं |

आज 21वीं सदी में आने के बाद भी ये सब देखने और सुनने को मिलता है। आख़िर कब तक औरतों को ये समाज अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करता रहेगा।

आज महिला दिवस पर संपूर्ण विश्व में न जाने कितने वादे होंगें, कितनी योजनायें बनेगी, कितने भाषण होंगे| करोड़ों की संख्या में लोग फेसबुक और ट्विटर पर लिखेंगे, एक दुसरे को मेसेज फॉरवर्ड करेंगे और रात होते ही #TGIF हैशटैग के साथ दिन का आखिरी इन्स्टाग्राम पोस्ट करके सो जायेंगे|

महिला दिवस मनाने का उद्देश्य तब पूरा होगा, जब महिलाओं के खिलाफ होने वाले शोषण कम होंगे, आपराधिक मामले कम होंगे, और महिलाओं को समाज में बराबर का दर्ज़ा मिलेगा।

 

Rohit Jha

A writer who is willing to produce a work of art, To note, To pin down, To build up, To make something, To make a great flower out of life even if it's a cactus.

Leave a Reply