मन की व्यथा – शालिनी सिंह

महिला दिवस के अवसर पर पेश हैं शालिनी सिंह की कविता- “मन की व्यथा”

Shalinee Singhक्या मेरा वजूद ,
इतना ही है इस जहां में ?
क्या लड़ नहीं सकती मैं ,
अपने अस्तित्व के लिए ?
या फिर पैदा ही हुई हूं इस गुलिस्तां में ,
अपने संसार से विदा होने के लिए ।
आज आगमन पर मेरे , रोया सारा जहां है ।
मन की बस आज यही व्यथा है,
ए खुदा तू कहां है ?
हे ईश्वर तू बसता कहां है ??

क्या आसमा को भी अफ़सोस था ,
तभी तो मेरे आगमन पर रोया था ।
आखिर गुस्ताखी क्या कि मैंने खुदा ,
जो दिए मुझे बेटी बना ।
ना डोल ना नगाड़े,
बस बजे तो ताशे थे ।
क्या मुझ में ऐसा खोट है ,
जो जमाने ने दिया ,मेरे मां-बाप को इतना चोट है ।
क्या बेटी जनना पाप है ?
यह सोचता, आज हर बेटी का बाप है ।
मन की बस आज यही व्यथा है _
ए खुदा तू कहां है
हे ईश्वर तू बस्ता कहां है ??

कैसी दिवाली ,कैसी होली थी ।
बस बदले में बातों और तानो की बौछार ।
और सौगात में मिली आंसुओं की झोली थी ।
कभी मिट्टी के भाव में बिकती ,
तो रोजाना किसी के हवस का शिकार बनती थी ।
कहते हैं , कि हस्ती मिटती नहीं किसी की _
पर मेरी तो हर रोज एक नहीं हंसती थी ।
मन की बस आज यही व्यथा है _
ए खुदा तू कहां है
हे ईश्वर तू बस्ता कहां है ।

आज बिलख-बिलख कर रोती है,
और पूछती हूं इस जहां से _
आज अंत हुआ दुस्साहस का ,
ए मूर्ख समाज तू उत्तर बता ।
जा पढ़ ले , महाभारत और रामायण आज _
और देख क्या मिला कभी नारी को सरताज ।
ये धरती, जहां तू कर रहा चीर हरण ,
उसकी रक्षा हेतु भी एक माता है ।
इस संपूर्ण सृष्टि कि एक जननी है ,
फिर भी तू देख ए मनुष्य, तेरी उसके लिए क्या करनी है

सरहद पर जो भी जाता है ,
उसका प्रेम भी भारत हेतु एक माता है ।
फिर भी बार बार सौ बार, क्यों ये कहा जाता है ?
कि बेटा ही कुल का यश बढ़ाता है ।
मन की बस आज यही व्यथा है,
ए खुदा तू कहां है
हे ईश्वर तू बसता कहां है ??

Rohit Jha

A writer who is willing to produce a work of art, To note, To pin down, To build up, To make something, To make a great flower out of life even if it's a cactus.

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